जीवन ही देवता है।

 जीवन क्या है? समान्यतः जन्म और मृत्यु के बीच का कालखंड जीवन कहलाता है। परंतु वास्तव में जीवन की केवल इतनी ही परिभाषा नहीं हो सकती है। जीवन अनंत यात्रा है। एक यात्री की तरह इनके अपने अपने उद्देश्य होते है। हम  सड़क पर चल ल रहे होते हैं तो यात्री , विद्यालय  में होते है तो शिक्षक या विद्यार्थी, बाज़ार में होते है तो क्रेता या विक्रेता, मक्खी मच्छड़ के लिए सुस्वादु भोजन, पिता के लिए पुत्र और पुत्र के लिए पिता, पति के पत्नी और पत्नी के के पति, अस्पताल में रोगी, पार्कों में भ्रमण करने वाले और कार्यालय में अधिकारी होते है। फिर हम कभी कहेंगे यात्री, कभी छात्र, कभी ग्राहक कभी भोजन का खजाना आदि आदि। पर क्या इनमें से केवल एक परिचय देने से हमारा परिचय पूर्ण हो जाता है? उत्तर स्पष्ट है नहीं। तो फिर हम क्या है?  

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