संदेश

महामानव बनने की विधा

 उचित होगा कि आगे का प्रसंग प्रारम्भ करने के पूर्व हम अपनी जीवन साधना के, स्वयं की आत्मिक प्रगति से जुड़े तीन महत्त्वपूर्ण चरणों की व्याख्या कर दें। हमारी सफल जीवन यात्रा का यही केन्द्र बिन्दु रहा है। आत्मगाथा पढ़ने वालों को इस मार्ग पर चलने की इच्छा जागे, प्रेरणा मिले तो वे उस तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करें, जो हमने जीवन में उतारा है। अलौकिक रहस्य प्रसंग पढ़ने-सुनने में अच्छे लग सकते हैं, पर रहते वे व्यक्ति विशेष तक ही सीमित हैं। उनसे ‘‘हिप्नोटाइज’’ होकर कोई उसी कर्मकाण्ड की पुनरावृत्ति कर हिमालय जाना चाहे, तो उसे कुछ हाथ न लगेगा। सबसे प्रमुख पाठ जो इस काया रूपी चोले में रहकर हमारी आत्म-सत्ता ने सीखा है, वह है सच्ची उपासना, सही जीवन साधना एवं समष्टि की आराधना। यही वह मार्ग है जो व्यक्ति को नर मानव से देवमानव, ऋषि, देवदूत स्तर तक पहुँचाता है। जीवन धारणा के लिए अन्न, वस्त्र और निवास की आवश्यकता पड़ती है। साहित्य सृजन के लिए कलम, स्याही और कागज चाहिए। फसल उगाने के लिए बीज और खाद-पानी का प्रबन्ध करना है। यही तीनों ही अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण है। उनमें एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।...

जीवन ही देवता है।

 जीवन क्या है? समान्यतः जन्म और मृत्यु के बीच का कालखंड जीवन कहलाता है। परंतु वास्तव में जीवन की केवल इतनी ही परिभाषा नहीं हो सकती है। जीवन अनंत यात्रा है। एक यात्री की तरह इनके अपने अपने उद्देश्य होते है। हम  सड़क पर चल ल रहे होते हैं तो यात्री , विद्यालय  में होते है तो शिक्षक या विद्यार्थी, बाज़ार में होते है तो क्रेता या विक्रेता, मक्खी मच्छड़ के लिए सुस्वादु भोजन, पिता के लिए पुत्र और पुत्र के लिए पिता, पति के पत्नी और पत्नी के के पति, अस्पताल में रोगी, पार्कों में भ्रमण करने वाले और कार्यालय में अधिकारी होते है। फिर हम कभी कहेंगे यात्री, कभी छात्र, कभी ग्राहक कभी भोजन का खजाना आदि आदि। पर क्या इनमें से केवल एक परिचय देने से हमारा परिचय पूर्ण हो जाता है? उत्तर स्पष्ट है नहीं। तो फिर हम क्या है?